बॉम्बे हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के एक आदेश ने न्यायाधीशों और वकीलों में हड़कंप मचा दिया है। न्यायाधीशों और वकीलों की पेशानी पर बल ला दिया है। रजिस्ट्रार जनरल का आदेश है कि सभी जज उनके द्वारा पारित आदेश एवं निर्णय उसी दिन CIS सर्वर पर अपलोड करें।
उल्लेखनीय है कि बॉम्बे हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल श्री स्वप्निल खाती ने 4 अप्रैल 2026 को महाराष्ट्र एवं गोवा राज्य के सभी न्यायिक अधिकारियों को आदेशित किया है कि वे उनके द्वारा पारित आदेश एवं निर्णय उसी दिन CIS सर्वर पर अपलोड करें। यदि किसी कारणवश वे उन्हें उसी दिन अपलोड नहीं करते हैं तो इसके संबंध में कारणों सहित विवरण प्रस्तुत करें। आदेशों एवं निर्णयों को समय पर अपलोड न करना न्यायिक अधिकारी की ईमानदारी से संबंधित कदाचार माना जाएगा। निर्धारित समय के भीतर आदेशों को अपलोड करने के संबंध में न्यायिक अधिकारी को ‘परिशिष्ट A’ में मासिक प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना होगा।
सबसे बड़ी बात, इस आदेश का पालन न करने पर न्यायिक अधिकारियों को उन्हें विभागीय जांच के बिना ही निलंबित कर दिया जाएगा।
रजिस्ट्रार जनरल का एक और निर्देश है कि 1 अप्रैल, 2026 के बाद उनके द्वारा पारित सभी ऐसे आदेश, जो अभी तक अपलोड नहीं किए गए हैं, उन्हें आज ही अपलोड करें। 1 अप्रैल, 2026 को या उससे पहले पारित किसी भी आदेश को, माननीय उच्च न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना अपलोड न करें।
इसके अतिरिक्त, 1 अप्रैल, 2026 से पहले पारित आदेशों को अपलोड करने के लिए, न्यायिक अधिकारियों को यह कारण बताना होगा कि आदेश एवं निर्णय पहले क्यों अपलोड नहीं किए गए, तथा इसके लिए उन्हें प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय से अनुमति प्राप्त करनी होगी।
रजिस्ट्रार जनरल ने इस प्रकार का आदेश किस कारण और किस दशा में पारित किया वकीलों की समझ से परे है। वकीलों का कहना है कि प्रैक्टिकली ऐसा करना जजों के लिए असंभव है। काम का बोझ अत्यधिक है। साथ ही निर्णय एवं आदेश उसी दिन अपलोड करने का निर्देश BNSS-2023 की धारा 392(4) के विपरीत है, क्योंकि यह धारा स्वयं निर्णय सुनाए जाने के बाद अपलोड के लिए 7 दिन का समय देती है।
CrPC की धारा 353(2)/BNSS की धारा 392(2) के अनुसार ट्रांसक्रिप्ट पर हस्ताक्षर केवल “जैसे ही वह तैयार हो जाए” किए जाने चाहिए — उसी दिन करना अनिवार्य नहीं है।
“बिना नोटिस” निलंबन की धमकी देना और “विभागीय जांच को समाप्त करना” संविधान के अनुच्छेद 311(2) का उल्लंघन है।
विलंब से अपलोड को “ईमानदारी से संबंधित कदाचार” बताना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है और यह कलंकित करने वाला है।
और सबसे बड़ी बात, इस प्रकार से न्यायिक अधिकारियों को निलंबन की धमकी देने का अधिकार रजिस्ट्रार जनरल के पास नहीं है।
